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धार्मिक विधि यानि धर्म के लिए किये जाने वाले कार्य या कर्मकाण्ड या धार्मिक विधि के माध्यम से ईश्वरीय ज्ञान एवं आचरण का ज्ञान हमें प्राप्त होता है। कहा ही है-

"आचार: प्रथमोधर्म:"

अर्थात् आचरण ही प्रथम धर्म है। आचरण यानि जीवन में नियमितता या क्रियाशीलता। हम अपने नित्य जीवनं को कैसे जियें तथा विशेष समय में अपने पर्व त्योहारों को किया करे? इन सबके ज्ञान के विषय में जो कुछ ऋषियों ने दिशा निर्देश दिया है, उसी को हम धार्मिक विधि या कर्मकाण्ड यानि "यज्ञ" कहते हैं।

वैदिक संस्कृति का प्रधान अंग है यज्ञ। यज्ञ के द्वारा ही मनुष्य का इहलोक एवं परलोक में कल्याण होता है। तभी तो जन्म से लेकर मनुष्य के अंत तक सभी संस्कारों एवं व्रतादि पर्व पर हवन (यज्ञ) किया जाता है। वेदों में भी उपासना एवं ज्ञानकाण्ड से अधिक मंत्र कर्मकाण्ड में उपयुक्त है। इसलिये सर्व जनमानस के कल्याण के लिए कर्मकाण्ड ही श्रेयस्कर है। गीता में कहा है कि-

"अन्नादभवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव:।
यज्ञादभवति पर्जन्यो यज्ञ: कर्म समुदभव:।।"

समस्त प्राणी अन्न से उत्पन्न होते है और अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है और वर्षा यज्ञ से होती है तथा वह यज्ञ (यज्ञकर्म) से होता है। कालिका पुराण में भी लिखा है कि "सर्वयज्ञमयं जगत" अर्थात सम्पूर्ण जगत ही यज्ञ मय है। संस्कारों में भी मान्य एवं प्रचलित षोडश ही संस्कार लिये गये है। इनके द्वारा ही मनुष्य द्विज अर्थात् दूसरा जन्म पाता है। ऐसा संस्कार सम्पन्न द्विज अनेक प्रकार के यज्ञ कर सकता है और इसके द्वारा लौकिक-परलौकिक उत्कर्ष प्राप्त कर सकता है।

यज्ञों के एवं संस्कारों के नाम निम्नलिखित है, जिन्हें हम सम्पन्न कराते हैं। जैसे- विविध प्रकार कि पूजा, नवग्रहों के जप-हवन, महामृत्युंजय अनुष्ठान लघुरूद्र, महारूद्र, महारूद्र स्वाहाकार, नक्षत्र शान्ति, ग्रहशान्ति जनन शान्ति, वास्तु शान्ति, उदक शांति, उपनयन/विवाह संस्कार नवचंडी, शतचंडी गणेशयाग, विष्णु याग, लक्ष्मी याग, सुदर्शन याग आदि।

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विविध प्रकार कि पूजा:

  1. नवग्रहों के जप-हवन
  2. महामृत्युंजय अनुष्ठान
  3. लघुरूद्र
  4. महारूद्र 
  5. महारूद्र
  6. स्वाहाकार 
  7. नक्षत्र शान्ति 
  8. ग्रहशान्ति जनन शान्ति
  9. वास्तु शान्ति
  10. उदक शांति
  11. उपनयन/विवाह संस्कार
  12. नवचंडी 
  13. शतचंडी
  14. गणेशयाग
  15. विष्णु याग
  16. लक्ष्मी याग 
  17. सुदर्शन याग आदि।

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